कौन है तू ?

तू चूर है गुरुर में
की आईने में दिखता अक्स है तू ,
जो जल के राख़ बन जाये ,
वो नहीं शख्स है तू .

तू तेज है सूरज का ,
और चाँद का नूर है ,
खुद खुदा ने तराशा जिसको ,
तू वही कोहिनूर है .

न सांसों का प्रवाह ,
न बहता रक्त है तू ,
बह रहा है प्रतिपल ,
वो सुहाना वक्त है तू .

पर्वतों के गुरुर जो
चीर के बनाये राह तू ,
जो थम सके कभी न ,
उस सरिता का प्रवाह है तू .

न करना तुलना किसी से ,
हर इंसान अलग है ,
खुदा की नज़्म है ये दुनिया ,
और लफ्ज़ है तू .

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