प्रेम

फूलों की सुगंध सा ; काँटों की चुभन सा ,

सूर्य के प्रकाश सा ; हवाओं की आवाज़ सा ,

गीत में संगीत सा , है मेरे स्वभाव सा प्रेम .

 

रिश्तों की बुनियाद यही हो ,

जहाँ जज़बात दिलों में हो ,

निर्दोष ,निरअहंकार, निर्भय दिल मे,

बस्ता है प्रेम .

 

सागर की लहरें है जितनी ,

फूलों पर फिरती है तितली,

जैसे झूमते है बादल गगन में,

उतना स्वतंत्र है प्रेम .

 

है भीग रहा संसार जिसमे ,

उस वर्षा का स्त्रोत है प्रेम.

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प्रेम

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